
मशहूर अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और कोच जसपाल राणा का असमय जाना भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति है। राणा जी से मेरा कोई खास परिचय तो नहीं था, लेकिन मुलाकातें अक्सर होती रही। उनसे पहली मुलाकात 1994 के करीब तब हुई जब मैं दैनिक जागरण नई दिल्ली में हुआ करता था। एक शाम मैं हर दिन की तरह थका-मांदा ऑफिस पहुंचा। वरिष्ठ खेल पत्रकार राजेन्द्र सजवान जो कि उन दिनों देश के तमाम अखबारों में छपते थे और शाम को दैनिक जागरण में आया करते थे, उन्होंने मुझसे पूछा ‘दाता आज कख बिटिन छै तू औणु?’, इस पर मैंने भी कहा कि ‘बस, पूछा न भैजि, भौत जादा भटकि तैं छौं औणू, पता नि किलै भटकणा छां हम इथा? अपनी भाषा में हो रहे इस वार्तालाप को उस वक्त वहां राजेन्द्र भाई के पास बैठा एक नौजवान बड़ी तल्लीनता से सुन रहा था और उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
मैं समझ गया कि यह युवा अपने यहां का है और हमारे वार्तालाप पर प्रसन्न है। मैंने उस युवा की पीठ पर स्नेहवश हाथ रखकर पूछा ‘यु भुला कु च?’ इस पर राजेन्द्र भाई ने कहा ‘दाता नि छै तु पछाणु, जसपाल राणा च वु।’ तब तक मैंने जसपाल राणा के बारे में पढ़ा एवं सुना ही था, लेकिन अब पहली मुलाकात भी हो गई। यह मुलाकात मुझे बहुत अच्छी लगी।
इसके बाद भी अक्सर उनसे कार्यक्रमों में मुलाकातें हो जाया करती थी। आज उनके निधन का समाचार मिला तो बहुत दुख हुआ। दुख इस बात का है कि वे महज 49 साल की उम्र में ही देश-दुनिया को अलविदा कह गए। ईश्वर ने मशहूर निशानेबाज जसपाल राणा को उम्र कम दी, लेकिन फिर भी शुक्र है कि ऊंचाइयां काफी अच्छी दी।
जसपाल भारत के ऐसे शूटर थे जिन्होंने एशियाई खेलों, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियाई चैंपियनशिप में देश के लिए कई मेडल जीते और विश्व में विशेष पहचान बनाई। उन्होंने अपने शानदार करियर के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया और कई गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीते।
एक कोच के तौर पर भी उन्होंने देश के लिए अहम भूमिका निभाई। ओलंपिक मेडलिस्ट मनु भाकर की सफलता में भी उनका अहम योगदान रहा। रिपोर्ट्स के अनुसार, जसपाल म्यूनिख में हुए आईएसएसएफ वर्ल्ड कप के बाद जर्मनी से लौट रहे थे और इस दौरान उनकी अचानक से तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनका इलाज चल रहा था, लेकिन काल के क्रूर हाथों ने उन्हें समय से पहले ही देश से छीन लिया। जसपाल राणा को सादर श्रद्धा सुमन।
~ दाताराम चमोली
