
बहुत समय पहले की बात है। किसी गाँव में एक बुढ़िया, उसकी बेटी और नवविवाहिता बहू रहती थी। बुढ़िया की बहू तो मेहनती थी, लेकिन बेटी बहुतआलसी या यूँ कहें कि कामचोर थी।
एक दिन जेठ में महीने में उनकी गेहूँ की दैं थी ( बैलों को घुमाकर गेहूँ की मड़ाई कर अनाज प्राप्त करने की प्रक्रिया ) वे बारी-बारी बैलों को घुमा रहे थे , धूप बड़ी तेज पड़ रही थी। थोड़ी देर दैं करके बैल गर्मी से हाँफने लगे थे। बुढ़िया ने बैलों को हाँफते देखा तो , तुरंत खोलकर पानी पिलाने को कहा। चूँकि ननद-भाभी बातों-बातों में काम भूल जाती थीं, इसलिए बुढ़िया ने लालच दिया कि जो पहले पानी पिलाकर लाएगी उसे मैं खाने को खीर दूँगी।
दोनों बिजली की चमक के साथ बैलों की तरफ लपकी। दोनों ने तुरंत अपने-अपने बैलों को पानी के स्रोत की तरफ हाँकना शुरू कर दिया। लड़की ने अपने बैलों को खूब हाँका। खूब डंडे से भी पीटा, लेकिन फिर भी उसकी भाभी के बैल आगे निकल गए और वो पीछे रह गई। आधे रास्ते में पता नहीं उसे क्या सूझा कि उसने अपने बैलों की जोड़ी वापस घर की तरफ मोड़ दी और प्यासे बैल खूँटों पर बाँध दिए।
बुढ़िया ने बेटी को विजयी समझा और उसे खीर खाने को दे दी। उस समय भाभी ने भी ननद की शिकायत नहीं की और उसे खीर खाने दी। इसके बाद वह बोली ,” ननद जी अब आपने खाना खा लिया है ,अब तो बैलों को पानी पीला दो। वो कब से प्यासे बाँध रखे हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी । गोठ में एक बैल दम तोड़ रहा था। मरते-मरते उस असहाय प्राणी ने ननद को फिटकार ( श्राप ) दिया कि जैसे तूने मुझे पानी के लिए तड़पाया, जा तू भी चिड़िया बन जायेगी और जिंदगी भर पानी के लिए तड़पेगी।
कहते हैं उस बैल के श्राप से वो लड़की चिड़िया बन गई ,और भरी जेठ की दुपहरी में प्यास से तड़पकर ,सरग दिदा पाणी ,पाणी या द्यो कका पाणि ,पाणि के करुण स्वर में कूकती है।
नोट-गढ़वाली लोककथा “सरग दिदा पाणि पाणि” का कोई लेखक नहीं है, बल्कि यह एक पारंपरिक गढ़वाली लोककथा है जिसे गढ़वाल क्षेत्र में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से सुना और कहा जाता रहा है।
