उत्तराखंड में प्रकाश पर्व दीपावली का उल्लास कोई एक दिन का नहीं , बल्कि कई दिनों का होता है। एक बहुत पुराने गढ़वाली लोक गीत “बर ऐन बगवाली गाजे सिंह, सोल ऐन सराध गाजे सिंह”, से इस बात का पता चलता है कि यहाँ 12 दिवालियाँ मनाई जाती हैं। दिवालियों के अवसर पर कई जगहों पर भव्य मेलों का आयोजन भी होता है। दिवाली के दिन लोग भैलो खेलते हैं। भैलो देवदार या चीड़ की लकड़ी की मशाल होती है, जिसे जलाकर लोग गाँव के किसी चौक या खेत में इकट्ठा होते हैं और अपने चारों ओर घुमाते हैं। रात के समय गाँव-गाँव में छोल-दमाऊँ बजते हैं। लोकगीत और सामूहिक नृत्य चलते हैं। उससे पहले सुबह के समय लोगअपने मवेशियों को पूजते हैं और उन्हें अन्न का भोग लगाया जाता है। घरों में पारंपरिक पकवान बनते हैं। कार्तिक अमावस्या राज्य के सभी भागों में एक समान मनाई जाती है, लेकिन इसके बाद 11वें दिन पर्वतीय क्षेत्र में इगास बग्वाल मनाने की परंपरा चली आ रही है। यह दिवाली काफी धूमधाम से मनाई जाती है।
इगास बग्वाल उत्तराखंड की खास पहचान है। प्रवासी उत्तराखंडियों भी इसे देश-विदेश में मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे थे, तो पहाड़ों तक इसकी खबर 11 दिन बाद पहुंची थी। इसी कारण यहाँ यह दीपावली कार्तिक अमावस्या के बाद 11वें दिन मनाने की परंपरा चली आ रही है।
मंगसीर बग्वाल आमावस्या के एक माह बाद मनाई जाने वाली दिवाली है। यह ऊँचे पहाड़ी इलाकों जैसे चंपावत, बागेश्वर, टिहरी और जौनसार बावर में मनाई जाती है। इसे मंगसीर बग्वाल या बूढ़ी दीपावली भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शासनकाल में तिब्बती लुटेरे गढ़वाल की सीमाओं में घुसकर लूटपाट करते थे, तो तब राजा ने माधो सिह भंडारी और लोदी रिखोला के नेतृत्व में चमोली के पैनखंडा और उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र से गरतांग गली नेलांग के रास्ते सेना भेजी। भोट प्रान्त दावाघाट में तिब्बती आक्रमणकारियों को पराजित करने के बाद विजयी होकर जब वीर माधो सिंह अपने सैनिकों के साथ वापस टिहरी रियासत में पहुंचे, तो तत्कालीन समय से ही विजयोत्सव के रूप में टिहरी रियासत (संपूर्ण जौनपुर, रवांईं, सकलाना, धौंतरी, टकनौर, बाड़ाहाट, बाड़ागड्डी, धनारी, नगर क्षेत्र) में मंगसीर बग्वाल मनाने की परंपरा चली आई आ रही है। एक मान्यता यह भी है कि भगवान राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने की खबर ऊँचे पहाड़ों तक एक माह बाद पहुंची थी। जो भी हो दीपावली के ये विविध रूप उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति की अनोखी झलक हैं। (हिमालय की बात)
